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बंद लिफ़ाफ़ों में - कामिनी मोहन म

Kamini MohanKamini Mohan September 2, 2022
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आत्मीय स्मृति के झरे शब्द
बंद लिफ़ाफ़ों में
आत्मा के जल से भीगकर तरोताज़ा रहते हैं।
जीवन को तर-ब-तर करते हुए
कुछ माँगते कुछ देते हुए
सदाएँ देते रहते हैं।

शिलालेख की तरह
पुराने बक्से में रखी हुई कुछ चिट्ठियाँ अधूरी है।
शायद ख़ुद में समा लेती हैं सब
इसलिए चिट्ठियाँ कहती हैं
चिट्ठी को पढ़ा जाना ज्य़ादा ज़रूरी है।

सुख-दुख आप-बीती सुनी-कही बाते
जब आवन को कहकर नहीं आते
तब पढ़ने में शब्दों की गूँज सुना जाते हैं।
मनुष्य पर बीती दर्ज़ करते हैं
और फिर महान भविष्य की उम्मीद जगा जाते हैं।

लिखे शब्दों को टटोलकर
मौन होना संभव नहीं होता।
दिल के काग़ज़ पर लिखी चिट्ठी को
छोड़कर जीना संभव नहीं होता।

समभाव में चिट्ठी की सिलवटें हटती नहीं
क्योंकि प्रसन्न या उदास होना बस में नहीं।
सरकारी दफ़्तर की तरह प्रयोजन नहीं
कोई तारीख़ और पत्रांक कही दर्ज़ नहीं।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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