आशाओं के ढाँचे - कामिनी मोहन।'s image
Poetry1 min read

आशाओं के ढाँचे - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan September 14, 2022
Share0 Bookmarks 150 Reads1 Likes
घर की चारदीवारी के चारों ओर
उँगलियों के स्पर्श से
शुभकामनाएँ अंकित थीं।
दीवार की हर ईंट के साथ
कामनाएँ नया रिश्ता
क़ायम करती थीं।

पर काल चक्र चलता रहा और
पीछे छूटी आशाएँ पीछे रहीं।
जो उनने चाहा वो
टूटी तमन्नाएं टूटी रहीं।

फ़ेहरिस्त लम्बी है जीवन की
आशाओं के ढाँचे खड़े रहे।
उजड़े घर भीतर को
झुके-झुके 
धंसे रहे और
मन्नतों के फूल अहाते में ही पड़े रहे।

-© कामिनी मोहन पाण्डेय 

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts