192. आँख ढाँप ढाँप के
-© कामिनी मोहन।'s image
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192. आँख ढाँप ढाँप के -© कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan November 18, 2022
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टिमटिमाती रोशनी आँख ढाँप ढाँप के
बुझ गया दीपक काँप काँप के
पर होने और न होने को दुनिया बोले
सब चीजें है मौजूद गठरी कौन खोले।

हमने सोचा कि सब स्थायी होते होंगे
सही हो या कि ग़लत सब बोलते होंगे।

नहीं, कुछ ऐसे धूल है
आपस में बंधे हुए
प्रार्थनाओं से हैं गुंथे हुए
सब कुछ अनंत में है सिमटे हुए
कि अचानक ही
सूखी और गीली होती मिट्टी को देखते हुए
संग उसके बदलते हुए
कुछ और हो जाने पर ही ख़ुश होते होंगे।

बहुत प्राचीन स्वाद लिए
गीली जीभ से लिपटे होंगे
सूर्योदय और सूर्यास्त के लफ़्ज़ लिए
सुर्ख़ आवाज़ पर रंग छिटकते होंगे।

ज़वाब मिठास का लिए हैं
जो इस जमीन-आसमान के लिए हैं
बोझ नहीं होंठों पर
इज़हार चुपचाप किए हैं।

शून्य से शुरु होते हैं
ख़त्म नहीं होते हैं
एक दो तीन नहीं
सब अनंत होते हैं।

पर ख़ामोश!
अब मैं हूँ, सबके लिए
सोचता हूँ, तू बोल अपने लिए
यहाँ बनता नहीं अपने आप शून्य-सा गोल।
अनंत में शामिल होकर
ढूँढ़ तू अपना भूगोल

- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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