अखण्ड प्रेम दीप
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अखण्ड प्रेम दीप - © कामिनी मोहन पाण्डेय।

Kamini MohanKamini Mohan August 20, 2022
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अखण्ड प्रेम दीप
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

अब यहाँ,
मैं क्या-क्या नहीं कर सका
थोड़ा पूरा थोड़ा अधूरा
सोचकर उठ जाने वाला हूँ।

वो भी तब जब आवागमन का चक्र
पता नहीं पूरा कर सकता हूँ या नहीं
यहाँ सब चीज़े छोड़कर जाने वाला हूँ।
जमीन से भारी धैर्य चुप्पी साधे रहेगी
मैं यहाँ के इतिहास से निकल जाने वाला हूँ।

सारे पत्ते पीले हो जाएँगे
और ज़रा से हवा के झोंके से
सब ग़ायब हो जाएँगे
पलट कर पीछे देखने का नहीं कोई फ़ायदा
उजड़े पेड़ों पर आसमान उतर आएँगे

पथ में अकेला हूँ
वहाँ लोग-बाग़ नहीं होंगे
कोई हलचल न होगी
उस इलाक़े में तरसना न होगा
कि कोई मुझे देखे
सुने,
सराहे,
स्वीकार करे।
जब छूटे थे एक-एककर साथी
बस इतना ही समझे
असमय हैं बुझती प्रकृति से हर बाती
पर विलुप्त दीप के उजियारे को
जाने कौन है जो छिप कर बैठ स्वीकार करे।

वैरागी हो गया हूँ, शायद
इसलिए, थोड़ा-थोड़ा ही यहाँ जीवन का
व्यापार सजाने वाला हूँ।

देख-देख कर पहले भयभीत हुए
अब कंम्पित भय को भगाने वाला हूँ।
जहाँ सिर्फ़ कृष्ण की आभा दिखाई देगी और
प्रेम की बाँसुरी सुनाई देगी
मैं वहीं जाने वाला हूँ।

कौन रुका है कौन रुकेगा
प्रश्न नहीं पूछने वाला हूँ।
सुनो आत्म!
तुमसे भी साफ-साफ कहता हूँ
जो कुछ भी कर सको कर दो
मैं तुमसे मिलने के इंतज़ार में
अखण्ड प्रेमदीप जलाने वाला हूँ।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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