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210.नहीं, नहीं बस और नहीं -कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan January 13, 2023
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नहीं, नहीं बस और नहीं
कविता की भाषा पर गौर नहीं। 

कविता के धरातल का 
चाहे हो कोई ठौर नहीं,
पर कवि और उसकी कविता 
कभी इधर या कभी उधर नहीं। 

शब्द ही हैं जो बोल रहे हैं
शब्द ही मौन तोड़ रहे हैं
मानस के पंख खोल रहे हैं।
-© कामिनी मोहन।

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