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207.नव वर्ष -कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan January 1, 2023
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नव वर्ष 
नृत्य की सदी हो,
प्रेम की बहती नदी हो
ज़र्रे-ज़र्रे ने दुआएँ दी हो
गीत-संगीत में बंदगी हो। 

ज़र्द रिश्ता शीतल शजर हो,
ज़मीं पर ख़ुशनुमा मंज़र हो
खिला-खिला हर चेहरा हो
हर आशियाँ अहल-ए-नज़र हो।
चारों ओर रौशन चराग़ाँ हो,
क़दम मंज़िल तक फ़रोज़ाँ हो।
सर-ए-शाम उजाले जश्न मनाए यहाँ 
क़ामयाबी बे-हिसाब अरमाँ मेहमाँ हो।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

शब्दार्थ:
ज़र्रे-ज़र्रे : कण-कण
ज़र्द : पीले रंग का
शजर : वृक्ष
मंज़र : दृश्य, नज़ारा
अहल-ए-नज़र : अंतर्दृष्टि, सत्य प्रेमी
सर-ए-शाम : सुबह से शाम
चराग़ाँ: दीपमाला
फ़रोज़ाँ : रौशन, चमकदार 
अरमाँ: इच्छा, ख़्वाहिश
मेहमाँ : मेहमान 

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