195. अँधेरे में दूरसंवेदन लिए
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195. अँधेरे में दूरसंवेदन लिए -  कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan November 25, 2022
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मैं भावनाओं का मालिक हूँ,
मैं उनके बारे में सोच सकता हूँ।
लेकिन मैं बिना सोचे-समझे,
उत्पन्न हुए डर से डरता हूँ। 

जो पीछे छूट गए 
उनकी स्मृति में अलगाव देखता हूँ,
विलगाव देखता हूँ।
मैं डूबकर भी नहीं डूबता हूँ,
मैं महसूस करने को घूमता हूँ। 

छिप नहीं पाता हूँ,
अंतर्तम को उघेड़कर 
रक्त के जैसे बहता हूँ।
क्या उपयोगी है?
क्या अनुपयोगी है? 
समझ नहीं पाता हूँ। 

वर्षों से सिर्फ़ 
माचिस जलाने की आदत रखता हूँ।
ऐसी दूसरी किसी चीज़ की नहीं
सिर्फ़ आग की प्रतीक्षा करता हूँ। 

मलबा हैं उजड़े हुए मकान का  
जो वर्षों से यूँ ही पड़ा है।
दबी हुई आवाज़े
हँसी और दुख दर्द अपने पाँव पर
अब तक वहीं खड़ा है। 

दीवार के आईने में क़ैद है विश्वास 
मैं भी अभी वहीं हूँ,
मुझे मुख्य द्वार से बाहर आना है।
पर दुनिया आगे बढ चुकी है
सांस की तरह स्मृति का 
अंदर और बाहर आना-जाना है। 

बीते हुए को भूलकर जीना
जीते हुए भी मर कर जीना है।
दूर अनजान तारामण्डल के अँधेरे में,
अतीत की एक कविता का दूरसंवेदन लिए
अंतर्ज्ञान की अनुभूति की
ऊर्जा की बूँद बस पीना  है।
- © कामिनी मोहन।

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