191.बाज़ुओं के ज़ोर की पहचान
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191.बाज़ुओं के ज़ोर की पहचान - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan November 8, 2022
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मौन की माला फिरती नहीं
भाव उभरकर बिखरती नहीं।
तपती दुपहरी में फूल सूख भी जाए
शब्दों की टोकरी कभी सूखती नहीं।

कठोर पाषाण जैसे
शब्दों से
शब्दों के गूँजते अर्थों से
है संवाद बस इतना,
हैं सामने उपस्थित सवाल जितना।
साधना-आराधना
पूर्णता-अपूर्णता के सवालों से
है उलझना उतना,
जवाब का है सुलझना जितना।

रोका गया,
टोका गया,
सिर पर आज़ादी का तमग़ा
ठोका गया।
अपने आप से
संघर्ष करने को
विचारों के रण में झोंका गया।

पर जितना खुलना था
उतना खुलता गया।
क्योंकि कवि और कविता है स्वयं वहीं
ज्ञात और ज्ञाता है स्वयं वहीं
दृष्टि और दृष्टा है स्वयं वहीं।

वह ज़िंदगी का वरदान है,
बाज़ुओं के ज़ोर की पहचान है
अहम से उपजा स्वाभिमान है।
बस एक अभिमान है
प्रेम का अरमान है।
- © कामिनी मोहन 

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