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189. ज़िंदगी सड़क के किनारे - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan November 2, 2022
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ज़िंदगी सड़क के किनारे
गड़े खम्भों के सहारे
अन्धकार को दूर करने में लगी हैं।
दूर तक जाने के इंतज़ार में
आगंतुकों को एकटक देखने लगी है।

समय ने जो साँसे ले लिए हैं
अब उन ख़ाली जगहों में शब्द भर गए हैं।
कुछ मेरे इधर-उधर गिरे हुए हैं
कुछ रास्ते में ठोकर की तरह पड़े हुए हैं।

अस्तित्व के शब्द एक-एककर
दूर छोड़कर जाने को आतुर होने लगे हैं।
प्राण की क्रियाएँ सिर से पैर तक,
छाती के अंदरूनी पृष्ठों की
जागृति को मुक्त कर
शब्द बन प्रकट होने लगे हैं।

अँधेरे में जब सारी दीवारें खो जाती है
तब कविताएँ अँधेरे के
स्टेज पर वाचन करने लगती हैं।
नींद कविताई के समंदर से
पार जाने की सोचने लगती है।

यह जानकर कि असीमित अस्तित्व के बग़ैर
कोई अस्तित्वमान हो नहीं सकता।
कहीं कोई मार्ग प्रशस्त हो तो
शून्य के विस्तार का कारण हो नहीं सकता।

अस्तित्व के चारों तरफ़
असंख्य शब्द गहरे अँधेरे में
डूबकर हँसते-रोते बोलते रहते हैं।
समय से परे जाकर अस्तित्व को
बचाए रखने योग्य तरक़ीब
उठा लाने की सोचते रहते हैं।

- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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