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182. क़दम-क़दम - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan October 13, 2022
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जिस समय में हम जीते हैं,
उसका असर क्या है?

सारी परिपाटियां है उलझी हुई
तो फिर सरल क्या है?

जीवन सत्य चीज़ है!
तो उसका रुप क्या है?

परिणाम है मंज़िल अगर पहुँच गए
तो विस्तार का रास्ता कहाँ है?

जानता हूँ वक़्त से तेज़
ले जाना है क़दम।
कोमल पाँव चाहे हो फटे,
सुर-ओ-ताल मिलाना है
क़दम क़दम।

प्रेम का प्रश्न हाथ में लेकर
प्रेम के मीटर पर है तैरना।
बंसी के स्वर को बनाके लफ़्ज़
शब-ओ-रोज़ धड़कन में है ठैरना।

ढेरों प्रश्न ढेरों उत्तर
तर्क-वितर्क
राग-विराग
कोई एकाकी नहीं,
सूझ-बूझ
मौन सही।
जीने की राह पर
बढ़ते क़दम
क़दम-क़दम ही है सही।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय।

ठैरना: ठहरना।
शब-ओ-रोज़: दिन-रात 

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