181. फिर एक दिन - कामिनी मोहन।'s image
Poetry1 min read

181. फिर एक दिन - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan October 11, 2022
Share0 Bookmarks 159 Reads1 Likes
है बस
चारों ओर
मिट्टी, धूल, राख
राख बस राख
बेमतलब नहीं
है यह भी
राख का ठुआ
करता हैं इशारे।

विचार में
प्रेम की धार में
इकट्ठा
देखता हूँ,
हज़ार-हज़ार कणों को
हवा में घुलकर
तैरते देखता हूँ।

घाटियों, पर्वतों
पर चढ़कर
टूटते, बिखरते,
ठहरते देखता हूँ,
सूर्य की किरणों को भरकर
अनंत छवियाँ
गढ़ते देखता हूँ।

फिर एक दिन
बंद दरवाज़े को
एक साथ
खोलता हूँ,
अपने होने को
शिलालेख के जैसे
कमरे में रखता हूँ,
बीत चुकी सभ्यता के मानिंद
एक नवसभ्यता को
गर्व से
सृजित होते देखता हूँ।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts