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178. कहाँ है? - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan October 7, 2022
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हर देह पर खिलता है रोशनी का जादू
ठहरकर चमकता फिर जाता कहाँ है?
अँधेरा-उजाला आ आकर, जा जाकर
दिन-रात का पहर ले जाता कहाँ है?

काग़ज़ पर लिखकर संवाद पहुँचाते हुए
जिन रास्तों ने उठाया-गिराया कहाँ है?
मिट्टी से लिपटकर मिट्टी कमाते हुए
जो साथ जाए वो अपना-पराया कहाँ है?

फ़लसफ़े सुनाते लफ़्ज़ आसमां तक हैं जाते
नय्या है नज़र के सामने पर हवा के इशारे कहाँ है।
बुरी लगी है सयानी ज़िंदगी क़सम से
हरक़ते मौन है फ़र्ज़ पूछता ज़रूरत कहाँ है?

ख़ुद ही है बोलता और ख़ुद ही है सुनता
रग़ दुख से हैं भरा हुआ ज़ख़्म अनदेखा कहाँ है?
प्यासा का प्यासा रहा आँख खारे समन्दर के तट पर
ख़्वाहिशों को दबाकर ख़ुशी ढूँढ़ते कहाँ है?
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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