176.क़ितआ
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176.क़ितआ सरख़ुशी बस इतनी -कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan October 4, 2022
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न    चाहा   कभी    भी    कि   क़िस्तों   में देखूँ
धारावाहिक-सी    ज़िंदगी   के घटते वजूद को।
सरख़ुशी बस इतनी सिर्फ़ इनायत की नज़र देखूँ
रूह का सरापा और सुख़न के सँवरते वजूद को।
   - © कामिनी मोहन पाण्डेय 

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