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175. अंजाम से बेफ़िक्र- कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan October 1, 2022
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अंजाम से बेफ़िक्र आगाज़ करते रहे

धड़कते स्वर को अंजाम तक सुनते रहे।


अपलक दिल के सबब देखते रहे

प्रियतम की इक आवाज़ पर मिटते रहे।


अमिट प्रतीक्षा लिए इफ़्फ़त से बैठते रहे

सुनने को व्याकुल और विचलित होते रहे।


हर आहट हर दस्तक पर चलते रहे

अनहद भी सुकून से सुनते रहे।


साज़ और आवाज़ को हम बुनते रहे

हर क़दम ज़िंदगी की सरगम सुनते रहे।


चाहे दुश्वार हो सफ़र लब नग़्मे गुनगुनाते रहे

जिस्म-ओ-जाँ का फ़ासला मिटाते रहे।

-© कामिनी मोहन पाण्डेय

इफ़्फ़त : पवित्रता

अनहद : जो आघात से उत्पन्न न हुआ हो।

-काव्यस्यात्मा

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