197. जैसे शब्द अपने भीतर
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197. जैसे शब्द अपने भीतर -© कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan November 26, 2022
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दूसरों के साथ बोलना
और बातचीत करना
सिर्फ़ संपर्क जानकारी का
आदान-प्रदान है
या कुछ और है।
इसकी अप्रासंगिकता अनिश्चित है
या प्रासंगिक सोच निश्चित है।

यह सच है कि
संघर्ष की सड़क पर
अकेले चलने पर ही
ख़ुद को समझा जा सकता है।
यदि जीवन केवल ख़ुद को
ठीक करने की प्रक्रिया है
तो उस प्रक्रिया से गुजरा जा सकता है।
वास्तव में,
मैं तुम और हम कौन है?
वास्तविक या आभासी
या कुछ और समझा जा सकता है।

यह उपयुक्त प्रतिक्रिया
में इतना बदलना हैं कि
लोग पहचान सकते हैं।
मन की बात ख़ुशी के साथ
नृत्य कर जान सकते हैं।

धरती से आकाश तक चलते हैं
कुछ हिस्सा यहाँ
कुछ वहाँ तारों के बीच
फैली रोशनी में देखते हैं।
ठीक वैसे ही,
जैसे शब्द अपने भीतर
अपना आकार रखते हैं
ध्वनि के साथ रंग
ज़ेहन में साकार रखते हैं।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय।

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