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Kumar VishwasPoetry1 min read

तुम और तुम्हारी ज़ुल्फ़ें❣️

Jitendra SinghJitendra Singh February 22, 2022
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तुम और तुम्हारी ज़ुल्फ़ें❣️


बिखरी हुई कभी ये लहराती बनके रेशम धागे ज्यों,

भीगी भीगी तो लागे किसी सर्द सुबह में शबनम ज्यों,

कितने नख़रेकितनी अदायेंकितनी नादानियाँ ,

कितना कुछ छुपा इनमें ही,

तुम्हारी सादगीतुम्हारी चंचलतातुम्हारी ख़ूबसूरती,

सब बतलाती तुम इनसे ही,


कभी इन ज़ुल्फ़ों को कसकर बाँध ग़ुस्सा भी दिखलाती हो,

तो कभी बिखेर इन्हेंबाहों में अपनी समेट मुझे तुम लेती हो,

है  जाने और कितने करतब तुम्हारी इन रेशमी लटों के,

खुद चेहरे पे लाकर के इशारा हटाने का मुझे कर देती हो,

पर हर हाल में ये एक कमाल ज़रूर कर जाती है मुझ पर,

मैं जितना रोकूँ खुद कोपास तेरे खींच मुझे ले आती है,

और फिर मैं इन्ही में कहीं डूबता ही चला जाता हुँ❣️❣️


~Jeet

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