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नींद आँखों से कब उड़ चली

Jitendra SinghJitendra Singh October 4, 2021
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नींदे आँखों से कब उड़ी पता ही नहीं चला,

मन ख़्वाबों को बुनते बुनते कहाँ ले चला

निकले थे समंद्र की गहराई नापने ,

लहरों में कब खो गए पता भी ना चला!!

 

सोच थी इस आसमां पर छा जाने की,

इस दुनिया से कुछ अलग कर गुजर जाने की,

मुझसे थी जिनको उम्मीदें बेसुमार, उन्हें पूरा कर जाने की,

ये राहें कब खुद को खुद से दूर कर गयी पता भी ना चला!!

 

यारों का याराना, सबका हँसना हँसाना,

हर छोटी बात पे भी बेवजह खुशियाँ मनाना,

ग़मगीन लम्हों में भी बेअदब मुस्कराना,

वो हम कहाँ गए हमें पता भी ना चला!!

 

जिन्दगी की कश्मकश पूरा करने को,

चंद लोगो की नजरो में अच्छा बन जाने को,

बेच दिया हमने रियायतों में खुद को,

ये गुनाह हमसे कब हुआ हमें पता भी न चला!!!



Jeet


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