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 समय


अहर्निश चले अपनी धुरी

निष्णात तपस्वी समय


बदले हैं पल बीते हैं युग

ऋतु धर्म से अनभिज्ञ है

निर्वैर हो निर्लेप चलता

विश्रांत वैरागी समय ।


निरपेक्ष दृष्टि को लिए

अनंत पथ को साधता

निश्कामता निस्वार्थ

धूनी रमा आगत समय।


ना क्षितिज न आकाश में

न धरती न पाताल में

सूरज की डोरी से सदा

बंधन रहित साधक समय।


नित्य कर्मयुद्ध गूंजती

रणभेरी नवयुद्ध की

विचलित न होता मौन 

साध मूक है दर्शक समय।


न भेद है न राग है

न द्वेष ना अनुराग है

निर्लिप्त भाव में रमा

चिर योगी आराधक समय।



मधुश्री

मुम्बई महाराष्ट्र


@सर्वाधिकार सुरक्षित

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