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इनायत हो तेरी जो ग़र कुद्रत ए जहांन मुझ पर्,
मुझे सिफर सी फित्रत का बना दे इस कदर्,
जुड जायू किसी से पेहले तो तेरी धूल मे छुपा रहू,
आगे चलु तो ज़र्रे को आसमान कर दे मेरी नजर्,

अल्फाज़ मेरे न रुके न ख़यालों मे कमी हो,
जज़्बात खुशनुमा हि दिखे चहे आखों मे नमी हो,
घ़मो का सैलाब भी हो तो बह जाये अश्कों से,
मेरे ज़ख्मों से दुनिया को रेहने दे बेख़बर,

लकीरे हाथों से मिटने भी लगे जो मुख्तसर्,
अन्दाज तेरे इम्तिहानो के मुझ पर हो बेअसर्,
मिलूंगा तेरे ही आगोश मे एक दिन जब पुरा हुआ,
तब तलक़ मुझे गुम्नाम रेहने दे चारागर,

इनायत हो तेरी जो ग़र कुद्रत ए जहांन मुझ पर्,
मुझे सिफर सी फित्रत का बना दे इस कदर्,
जुड जायू किसी से पेहले तो तेरी धूल मे छुपा रहू,
आगे चलु तो ज़र्रे को आसमान कर दे मेरी नजर्।

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