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अन्नदाता और वर्षा

JAIDEV TOKSIAJAIDEV TOKSIA December 27, 2021
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आसमान में देख रे प्यारे

           बादल की बारात चली  है।

सहलाती- सी भीगी- भागी

           सावन की सौगात चली है।।


यह बारात जहाँ रुकेगी

         सींचेगी खेतों को तेरे।

गरज कङकती खेत मंडप में

          अब ये वर्षा लेगी फेरे।।


मुझे पता है तूं भय खाता

       अनावृष्टि, अतिवृष्टि से।

मुझे पता है तूं थर्राता

    बसंतकालीन ओलावृष्टि से।।


एक पालनहार वो रब है,

       जो संसार बनाता है।

दूजा पालनहार तूं प्यारे

       जो संसार चलाता है।


© जयदेव टोकसिया


  

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