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शायद तू यही कह रही है

Jai GurjarJai Gurjar December 31, 2021
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बीत जायेंगी रातें भी, दिन भी किसी बहाने से

गुजरेगी वो शाम कैसे जो गुजरी संग जमाने से

ज़िंदा लाश छोड़ गए तुम, कह कर कोई फसाना सा
लौट आओ गर हो सके तो करके कोई बहाना सा

मैं विरह में शायद तेरे, पलक झपकाना भूल गई
आंख सदा खुली रखती हूं, शायद मुझे मैं भूल गई

पहले भी जाने कितनी दफा, खोने से तुझे मैं खूब डरी 
नया नहीं है खेल तेरा ये, सांस तलक को हर बार मरी

तू बैरी किस जन्म का जाने बदला भी अब लूं कैसे
ख़िलाफ़ अगर हुई मैं तेरे तो जान गई फ़िर मेरी वैसे

खयाल कभी तो आता है करदुं आज़ाद तुझे खुदसे
पर सन्नाटा सा छा जाता है जैसे छूट गई मैं मुझसे
मर भी तो नहीं सकती मैं, सौगंध तेरी जो खाई हूं
वादा गर ना निभा सकूं तो गलत तेरी परछाई हूं

चल राम तुझे ना बना सकी, अब श्याम मेरा तू ही है
मैं सीता मैं राधा सब हूं , बस ध्यान मेरा अब तू ही है

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