आधुनिकता's image
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खपड़ैल ,
छपरा ,
और केवाड़ छूटत है,
आधुनिकता के अंधी दौड़ में,
हमार औलाद छूटत है...!

शाम के दुआरे के चौपाल छूटत है ,
बनिया के दुकानें के उधार छूटत है ,
घर ,
रिश्ता 
और परिवार टूटत है ,
आधुनिकता के अंधी दौड़ में,
हमार औलाद छूटत है...!

खेते से अब न साग टूटत है ,
मेढ़े के अब बाँध टूटत है ,
बिना कौनौ बात पर भी ,
बात-बात में अब हथियार छूटत है ,

केयू केयू के सम्मान कूंचत है ,
हाँथे बेटवा के अब कपार फूटत है ,
आधुनिकता के अंधी दौड़ में,
गाँव
हमार औलाद छूटत है...!

- गौरव शुक्ला"अतुल" 
 

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