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अधूरा प्रेम (स्वप्न)

JAGDISH PRASAD LODHAJAGDISH PRASAD LODHA November 17, 2021
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एक रात.....

किसी ने दिल के दरवाजे पर दस्तक दी,

क्या पता वो कोन थी,

कहाँ से आई थी,

वो मेरे संग चल रही थी,

जिसने दिल के तारों को छुआ,

दिल में प्रेम का पुष्प खिला,

दिल में एक संगीत उत्पन्न हुआ,

संगीत आवाज बनने वाला था,

सहसा वह कहाँ चली गई,

मेनें उसको खोजने की कोशिस की,

मेरी आँखें उसको खोज रही थी,

मेरी आँखे उसको खोजने में असफल हुई,

बस आँखों में पानी था,

दिल सहसा बैंठ गया,

क्या पता वो कोन थी,

जिसने दिल को छुआ,

वो संगीत जो आवाज नहीं बन सका,

आज भी दिन में दिल में उबल रहा है,

अच्छा होता,वो दिल के दरवाजे पर दस्तक नहीं देती,

ना दिल में संगीत उत्पन्न होता,

ना दिल में प्रेम का पुष्प खिलता,

ना आँखों में पानी होता,

पर दिल अब मान नहीं रहा,

मैं उसको कैसे समझाऊँ,

वो कौन थी,

कहाँ से आई थी,

सहसा मस्तिस्क बोल उठा,

अरे वो तो मन की तरंग थी,

सहसा दिल ने कहा,

तु क्या जाने प्रेम, अनुराग, करुणा,

और क्या जाने भावना,

जिससे पुष्प खिले,

पहली बार पुष्प खिला था,

वो भी मुरझा गया,

वो प्रेम कैसा था,

जो पहली बार किसी के लिए जगा था,

प्रेम का बांध बनने वाला था,

सहसा टूट गया,

मैं गोता नहीं लगा सका,

क्या पता वो मेरे मन का भ्रम था।

- जगदीश प्रसाद लोधा

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