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उच्श्रृंखल अकविता

Islam_SheriIslam_Sheri December 26, 2022
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उच्श्रृंखल अकविता 


वो बहुतायत हैं, बहुत थे ,

और वे रहेंगे भी।

उनमें से हर एक आत्ममुग्ध है,

अक्सर अपनी अपनी बात करते हैं ।


लेकिन जैसे ही वो गिरोह में आते हैं,

गिरोह बंद हो जाते हैं।

वो एक दूसरे की तारीफ करने लगते हैं।

वो एक दूसरे का चेहरा मोहरा

चमकाने लगते हैं।


एक दूसरे के सर में 

तेल लगाकर चम्पी करते हैं,

पीठ खुजाते, और मालिश करते हैं।

गोड़ दबाने पड़ें तो दबातें हैं,

कभी कभी गोड़ भी पड़ जाते हैं।


एक दूसरे की तारीफ करके 

लोहालोट होते रहते हैं।

वो आत्ममुग्ध अपनी दुनिया में 

खोए रहते हैं।


कभी कभी वो अपनी दुनिया से 

बाहर झांककर,

दूसरों को हेय दृष्टि के देखकर 

फिर अपने खोल में घुस जाते हैं।


वो ताकते रहते हैं मौके,

अपने को और और चमकाने के।

इसलिए फिर फिर एक दूसरे को,

बारी बारी से कंधे में बैठाते हैं।


नारे लगाने की ज़रूरत पड़ती है तो, 

नारे भी लगाते हैं।

शोर करने की ज़रूरत होती है,

तो शोर भी करते कराते हैं।


फिर अचानक पता लगा है कि,

किसी एक को अपना और दूसरों का

चेहरा चमकाने और गोड़ दबाने पर

ईनाम मिल गया है।


फिर वो हर्षित होते हैं कुछ कुछ,

जलन और ईर्ष्या भी करते हैं। 

एक दूसरे का चेहरा चमकाने 

और गोड़ दबाने लगते हैं।


इस्लाम शेरी

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