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रहुं बंदिनी या इन पाशो से मुक्त हो जाऊं...

मृत् रहु या जीवित हो जाऊं...

नारी हूं, हुं कोमल..पर क्या इतनी? की मूक कटाक्षो से ध्वस्त हो जाऊं..

वियोगनी भी मैं और वयोग मेरे ही..

पितृसत्तक एस पटल में क्या गुम हो जाऊं...

व्रत मेरे..और संकल्प मेरे ही, देहिक, आध्यात्मिक सब त्याग मेरे..

स्वामी बताओ है विधि का विधान यही तो..

क्यूं न मृत रहु मैं, क्यों जीवित हो जाऊं...

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