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हमारे गांव, चौबारे  हमारे,

कभी तो साथ में चलिए हमारे।


गये हम भूल  सब बिरहा की तानें।

कहाँ सजती है अब चौपाल द्वारे।


उगाते हैं फसल भरपूर लेकिन

कहां होते हैं अब उस से गुज़ारे।

कोई देता नहीं शादी को लड़कीहैं बैठे गांव में कितने कुंवारे।


फसल खलिहान में आने से पहले

महाजन आ धमकते हैं दुवारे।


अंगौछे से ढंके हैं शर्म अपनी

 हैं सारे गांव में फिरते उघारे।


टपकता है ये छप्पर बारिशों में।

हैं गिरती टूटकर कच्ची दीवारें।


जब आता है इलेक्शन, सारे नेता

 चले आते हैं बत्तीसी चियारे।


समझ आता नहीं इस ज़िन्दगी को

अब हंसकर या कि फिर रोकर गुज़ारें।


इन्दु प्रकाश




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