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एक बार फिर भ्रम-ए-इश्क़....

Indraj YogiIndraj Yogi December 5, 2021
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एक बार फिर भ्रम-ए-इश्क
हमने अपने दिल में पाल लिया,
झुकी आंखों से उसकी,
फिर शर्म-ओ-हया को जान लिया,


अब फिर हम दीवाने होंगे,
कागज,कलम,दवात,
और शायरी हमारा सहारा होंगे,


चुनेंगे एक और सनम,
अब आशिकी को हम,
होगा फिर एक बार और,
हमे भ्रम-ए-इश्क़,


फिर लटे उलझेंगी,
कानो के झुमकों से,
और आंखे झीलों-सी,
झिलमिलाएंगी,
टकरा अधरों रूपी नाव से,
शब्दो में फिर से,
चुनर लहलाएंगी,


तेरी ओर से लौटी,
पुरवाई फिर हमें सहलाएंगी,
दे झोंका तन को मेरे,
खुशबू को तेरी,
मेरी बांहों में भर जाएंगी,
उस रोज की तरह,
इस रोज भी,
करतूतें तेरी या मेरी,
कोई नई कहानी लिखवाएंगी,


पर नही उत्साह,
मन में मेरे,
जो था पहलों-पहल मेरे,
मन संकुचित है,
दुख से भर,
तेरे आभासों के साए से डर,


उठता हूं नींदों में,
तेरी आवाज सुनकर,
पुकार रही है तू,
या मौत मेरी मुझे,
या मोहब्बत मेरी दूसरी,


चल पड़े कदम,
पर उठते नही,
आंखों मे आंसू,
तेरे नाम के रुकते नहीं,
है खाली-खाली,
दिल का कोना,
कहां गुजरे रातें,
अब कहां है बिछौना,


दर-दर भटकता रहा हूं,
पर पुकार रही एक दर,
बन हमदर्द मेरी,
ठीक वैसी ही,
तुम-सी तुम-जैसी ही,
अधरों पर मुश्कान है,
झूमते-झुमके उसके कानो के
झिलमिलाते नम-सी आंखें,
खोजती है मुझे,
तरसती-तैरती

~इन्द्राज योगी

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