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तुमतुम कौन हो?

आईने से एक प्रतिबिंब पूछ रहा है,

हूबहू जो मुझसा बुझ रहा है,

हारे क्याऔर जीत क्या लिए,

ज़िंदग गुजर गईसीख क्या लिए,

तमाम उम्र भागे तुम पा लेने की चाह में,

फ़ाज़ दिख तो रहे हो ज़िंदगी की राह में,

मैंमुझसे पूछ रहे हो?

परछाई हो की कोई जादू दिखा रहे हो,

यू कुरेद कुरेद के कौन सी बात जता रहे हो,

मैंने कमा ली है दौलतशोहरतपैसे और नाम,

तुम क्या जानोकितनी मेहनत का ये है इनाम,

हँस हँस के प्रतिबिंब बोल रहा है

इतना कुछ है तुम्हारे पास तो खुश क्यों नही,

सुकून में ज़ेहन और सुलझी सी रूह क्यों नही,

उलझे हुए हो अपने ही सवालो में क्यों,

जवाबो को घेरे हुए हो अकड के लीबाज़ों में क्यों,

हर शय पे तुम शक करते हो,

हर जहर को तुम दिल मे भरते हो,

रिश्तों का तुमने तमाशा बनाया है,

अपनो से तुम ऐहतियात करते हो,

इंसान होकर इंसान से डरते हो,

नफरतो को दिल में भर तुम जलते हो,

ढूँढ लिया है तुमने ख़ज़ाना सारा,

इंसानियत के रत्न से तुम बस आह भरते हो,

कहोक्या है तुम्हारे पास,

कहो कौन हो तुम..!!! 

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