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तमाशा जात मज़हब का

Himkar ShyamHimkar Shyam February 11, 2022
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तमाशा जात मज़हब का, खड़ा करना बहाना है
सभी  नाकामियाँ अपनी  उन्हें  यूँ  ही छुपाना है

ढले सब एक  साँचे में, नहीं  कोई अलग लगता
मुखौटों  में  छुपे  चेहरे,  ज़माने को  दिखाना है

है सारा खेल कुरसी का, समझते क्यूँ नहीं लोगो
लगा कर आग नफ़रत की, उन्हें बस वोट पाना है

बदल जाती हैं सरकारें मगर सब कुछ वही रहता
हमें  तो  पाँच  सालों  में  मुक़द्दर  आज़माना  है

हमारे मुल्क की हालत बना दी क्या सियासत ने
सियासी  पैंतरे   सारे,  हमीं   पर  आज़माना  है
 
अभी तो राख में चिंगारियाँ बाक़ी बहुत 'हिमकर'
जलेंगी बस्तियाँ कितनी, हमें मिलकर बुझाना है

-हिमकर श्याम

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