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महफ़िल में आया जब वो क्या थे उस के हाव भाव ।
थकन उदासी कशमकश या मुस्कुराता चाव ।
लेने को सब्ज़ी निकला घिरा भीड़ में पकड़ा गया,
 हारा हुआ दल सत्ता सा अब कर रहा घिराव ।
पानी पे चलता देख योगी हंस रहा फ़कीर,
ले जाए पार पैसे में साहिल पे लगी नाव  ।
जंगल तो सारे  जल चुके इक वृक्ष  खड़ा मौन ,
 उड़ती चिता  से राख  कोई तापता  अलाव ।
 पैवंद हैं कबा पे ढूंढूं  ज़ख़्मों की  मरहम ,
वो मुस्कुरा के फिर नया दें जाता कोई घाव ।
कह कर खिलाफ़ दूसरे के हम  न दिल पे लें,
देकर बयान नेता जैसे  करते फिर बचाव  ।
     
      एच जीत सिंह हरी नौ
रचना मौलिक तथा अप्रकाशित है ।



 
 
 


 

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