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मेरे अंदर जो उठा खौफ़ इक ख्याल--सा है।
सामने रोज़ बिन जवाब इक सवाल--सा है।
रफू़गर कर ही चुका हर सि्मत से इक सीवन,
रूह के ज़ख्मों की तरह कोट मेरे हाल--सा है।
बहस में जाए उतर वो इतनी शिद्दत से,
नक़्श उसका जो दिखे बाल की इक खाल--सा है।
लाशें कंधे पे उठा देखते चिताओं को,
इधर बयान कि मामूली इक बवाल--सा है।
लोभ दाने  का और आ उतरे किस हथेली पर,
खुदकुशी होनी अब ऊपर सुनहरी जाल--सा है।
इतने दिन बीते भला कब ही तुम को याद किया,
कैसे दिन गुज़रे बिना तुम ये मलाल--सा है।
कोई जागे उठाए पीठ पर वो प्रश्न करे ,
वृक्ष पर लटका उल्टा काल इक बेताल--सा है।
                     एच. जीत सिंह हरी नौ







            
                 ृं


 

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