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मेरी लेखनी मेरी कविता 
यह क्यों ?

हर उभरती नस
 मसलने का अभ्यास
रुक रुक कर
चलने का अभ्यास
 छाया में थमने की आदत 
 यह  क्यों?

जब देखो दिल में एक जलन 
उल्टे उल्टे से चाल चलन 
सर से पांव तक छत छत विच्छत
यह क्यों ?

जीवन के दर्शन पर दिन-रात 
पंडित विद्वानों जैसी बात 
लेकिन मूर्खों जैसी हरकत 
यह क्यों ?

हरिशंकर सिंह सारांश  

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