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मेरी लेखनी ,मेरी कविता
कविता (वृक्ष की वेदना)

सिर्फ मेरा ही नहीं था,वो सजर तेरा भी था ।जिसको लूटा इस कदर ए दोस्त घर तेरा भी था।

 सिर्फ मेरा ही नहीं था वह सजर  तेरा भी था ।

पत्थरों को सर झुकाने का चला है सिलसिला, क्या पता किसको मिला है क्या सिला ...
जिसको पूजा उम्र भर
 वो रहनुमा तेरा भी था |

सिर्फ मेरा ही नहीं था
 वो सजर तेरा भी था ।

आँधियों के रास्ते में,
 तुम खड़े क्या सोचकर  खौफ खा ले जाएंगी ये आँधियां सब नोंच कर तन पै तेरे जो पडा था वो वसन मेरा भी था ।

सिर्फ मेरा ही नहीं था, वो  सजर तेरा भी था ।

वक्त था थोड़ा, बिताया दरबदर ,कसमें खाई थी निभाया उम्र भर ,
उम्र भर साया बना जो, यार तन मेरा भी था ।

सिर्फ मेरा ही नहीं था वो सजर तेरा भी था ।

वक्त की  इस दौड़ के अफसाने सारे लूटकर, चल दिया सारे तू नाते तोड़कर
 साथ में तेरे चला जो
वो कफन मेरा भी था ।

सिर्फ मेरा ही नहीं था
 वह सजर तेरा भी था ।

जिसको को लूटा उम्र भर ए दोस्त घर तेरा भी था ।

हरिशंकर सिंह" सारांश"
  

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