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लोगोंं को तरसते देखा है (कविता )

हरिशंकर सिंह 'सारांश 'हरिशंकर सिंह 'सारांश ' May 1, 2022
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मेरी लेखनी मेरी कविता 
लोगों  को तरसते देखा है
(कविता) समय चक्र

वह जो चलते थे शेर के मानिंद 
उनको भी पांँव उठाने के लिए
 सहारे को तरसते देखा है। 
लोगों को तरसते देखा है।।

जिनकी आंँखों की चमक देख
सहम जाते थे लोग,
उन्हीं नजरों को मेघाेें की तरह
बरसते देखा है।
लोगों को तरसते देखा है ।।

जिन हाथों के इशारे से
टूट जाते थे पत्थर 
उन्हीं हाथों को पत्तों की तरह
बिखरते देखा है ।
लोगों को तरसते देखा है ।।

जिनकी आवाज से कभी
 बिजली के कड़कड़ाने  का
आभास होता था,
उनके होठों पर भी जबरन चुप्पी का
ताला लगा देखा है।
लोगों को तरसते देखा है ।।

ये जवानी, ये ताकत, ये दौलत
कुदरत की देन है,
इनके रहते भी लोगों को
बेजान होते देखा है।
लोगों को तरसते देखा है ।।

खुद पर इतना गुमान
न करो दोस्तों ,
 वक्त की धारा में अच्छे अच्छों
को बहते देखा है ।।
लोगों को तरसते देखा है ।।

कर सको तो किसी को खुश करो,
दुख देते तो हजारों को देखा है ,
लोगों को तरसते देखा है ।।

हरिशंकर सिंह सारांश   

     

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