"कवि से बना कहानीकार "
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"कवि से बना कहानीकार " हास्य व्यंग रचना (कविता)

हरिशंकर सिंह 'सारांश 'हरिशंकर सिंह 'सारांश ' January 30, 2022
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मेरी लेखनी ,मेरी कविता 
"कवि से बना कहानीकार" हास्य व्यंग रचना (कविता)

शादी के पहले मैं बेरोजगार था ,आज भी बेरोजगार हूँँ ,फर्क सिर्फ इतना है कि पहले कवि था ,आज कहानीकार हूँँ।

 कवि से कहानीकार बनने की कहानी बड़ी निराली है ,बात शादी के पहले की यानी थोड़ी पुरानी है।

 पहले मैं श्रंगार रस की कविताएं लिखता था, शक्ल सूरत से गीतकार दिखता था ,पर शादी के बाद जब श्रीमती जी हमारे घर आईंं ,मेरे श्रृंगारििक  रूप को अधिक सहन नहीं कर पाईं।

 एक रात जब ,मैं कवि सम्मेलन से घर आया, मैंने उन्हें एक श्रंगारिक गीत सुनाया ,वे  बिगड़ गईंं, आव देखा न ताव मुझसे झगड़ गई ।

बोलीं
 पता नहीं किस-किस पर कैसे-कैसे गीत लिखते हो, गाते हो, रोज रात को, देर से आते हो, तुम्हारा यह गीत वीत
हमको बिल्कुल नहीं सुहाता है, तुम्हारा करेक्टर हमको डाउटफुल नजर
आता है।

मैंने कहा प्रियेेे, मेरे गीत है तुम्हारे लिए, वे  बोलीं देखो मुझे बेवकूफ मत बनाओ, सही-सही बताओ, जब मैं नहीं थी तो किसके लिए आहें भरा करते थे, गीत लिख लिख कर किस- किस पर मरा करते थे |

मैंने कहा प्रिये पहले मैं तुम्हारी कल्पना में गीत लिखता था, अब तुम्हारे प्यार में गीत लिखता हूँँ, फिर भी तुमको डाउटफुल दिखता हूँँ।

 पर मेरी यह बात उनकी समझ में न आई वो मायके चली गईंं, और वहांँ से चिट्ठी भिजवाई,

 गीत लिखना छोड़ दोगे तो वापस ससुराल आऊंँगी वरना सारी उम्र मायके में ही बिताऊंँगी।

 लिखना ही है तो  हास्य  लिखो, दूसरों को हँसाओ  और खुद भी हंँसमुख दिखो।

 क्योंकि विज्ञान भी यही कहता है, कि हँसने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

 लाइफ को खतरे में जानकर वाइफ की बात मानकर मैंने हास्य  लिखना शुरु कर दिया, पर जल्द ही इसका परिणाम भी भुगत लिया।

 एक कवि सम्मेलन में मैंने नेताजी पर हास्य  रचना सुनाई
रचना पब्लिक को तो पसंद आई ,पर नेता जी को नहीं भाई ,रचना की समाप्ति पर पब्लिक तालियां पीट रही थी, और नेताजी मुझे।।
मैं  एक हफ्ते अस्पताल में रहा, इसके बाद मैंने किसी नेता के बारे में कुछ भी नहीं कहा।।

 अगले कवि सम्मेलन में मैंने पुलिस पर एक रचना सुनाई ,तो एक दरोगा जी ने हमको अपनी पावर दिखाई।

 उनकी लाठी को आ गया जोश, मेैैं तीन दिन तक रहा बेहोश, चौथे दिन अपने आप को जेल के अंदर पाया, किसी  तरह जमानत करा कर घर आया ।।

 वे बोलीं
 पता नहीं कविताएं  कैसे सुनाते हो,  मर्द होकर भी पिटकर आते हो,

 उनकी बातों ने मेरा
पौरुष जगाया, मैंने वीर रस की कविताएं लिखने का बीड़ा उठाया।

 बाहर के एक कवि सम्मेलन में जब मैंने वीर रस  का एक गीत सुनाया, तो उसका भी गलत परिणाम आया।।

 मेरी ओजस्वी  कविता से लोगों में जोश भर गया, व्यवस्था के प्रति आक्रोश भर गया, लोगों ने अपना आक्रोश वहांँ खड़े पुलिस अधिकारी पर उतारा, इस बात को लेकर आयोजकों ने मुझे बहुत मारा।।

 मैं बहुत चीखा, चिल्लाया, किसी तरह से घर वापस आया ,
वे बोलीं
  
ये कैसे उटपटांग ढंग से आ रहे हो, ढंग से चलो सर्कस क्यों दिखा रहे हो? मैंने फटाफट सारा हाल बताया।।

 वे  बोलीं 
 तुमने फिर गच्चा खाया, मैंने कहा प्रियेे ,कविता लिखना सरल है, पर सुनाना बहुत कठिन है, अगर सुना भी दो तो सही सलामत घर आना उससे भी कठिन है ।।।
  
वे बोलीं
अगर कविता लिखना  तुम्हारे बस में नहीं ,तो कहानियां लिखा करो, पत्र-पत्रिकाओं में छपवाओ, शादी की है तो घर गृहस्थी भी  चलाओ।।

 दोस्तो
 तब से मैं कहानियांँ लिखने में ही रत हूँँ, आपकी दुआ से सही सलामत हूंँ।।

 हरिशंकर सिंह सारांश

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