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कब तलक यह ख्वाब देखूँ ?

हरिशंकर सिंह 'सारांश 'हरिशंकर सिंह 'सारांश ' May 28, 2022
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मेरी लेखनी मेरी कविता 
कब तलक यह ख्वाब देखूं? 
(कविता) 

अर्थ जब खोने लगे
 शब्द भी रोने लगे।।
वह बड़े कद में हुए
 सब उन्हें  बौने लगेंं।।

जख्म न देखे गए तब 
अश्रु से धोने लगे 
एक जज्बा था अभी तक 
आप जो छूने लगे ।।

कब तलक ये ख्वाब देखूूँ
वह मेरे होने लगे ।।
जिंदगी के मोड़ पर 
आप क्यों सोने लगे ?
शब्द भी रोने लगे ।।

हरिशंकर सिंह सारांश   

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