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  मेरी लेखनी ,मेरी कविता
 "दुर्गम पथ " (कविता) 
   छात्र विशेषांक  

पथ तेरा दुर्गम सही
 पर असंभव है नहीं।

 ज्ञान का दीपक जला है
 मन में तेरे ही कहीं,
पथ तेरा दुर्गम सही
 पर असंभव है नहीं।।
 
 देखकर कठिनाइयों को
 रास्ता ना छोड़ना,
 सबसे जो वादा किया
 वह कभी ना तोड़ना।

 खोजता जा ज्ञान की वह
अनकही परछाइयांँ
 चाहे कितनी भी पडें
 अब राह में कठिनाइयांँ।
  
आस को सिंबल बना
 जो छिपी अंदर कहीं,
पथ तेरा दुर्गम सही
 पर असंभव है नहीं।।

आस लेकर ज्ञान की
मंजिल को पाने की ललक,
 आंँखों में तेरे रोशनी,
 अंजाम पाने की चमक।।

 राह में तू ऐसे चल
दुनिया सुने तेरी धमक, 
ज्ञान का करदे उजाला
जो छिपा मन में कहीं ।।

पथ तेरा दुर्गम सही ,
पर असंभव है नहीं ।।

जीवन के अनुभव जोड़कर
 शिक्षक भी तेरे साथ हैं,
 क्यों डरे बेकार में
 जब मन में तेरे आस है।।

 ज्ञान पाने की तेरी
अनबुझी सी प्यास है, 
प्यास को अपनी बुझा
 है हल तेरे अंदर कहीं।।
  
पथ तेरा दुर्गम सही
पर असंभव है नहीं
 पर असंभव है नहीं

हरिशंकर सिंह सारांश 

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