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""बंँदिशों की दुनिया,आदर्शों की छाया" (कविता)

हरिशंकर सिंह 'सारांश 'हरिशंकर सिंह 'सारांश ' February 25, 2022
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मेरी लेखनी, मेरी कविता
"कभी बंँदिशों की दुनिया, कभी आदर्शों की छाया""  (कविता) शिक्षक विशेषांक 

कभी बंदिशों की दुनिया
कभी आदर्शों की छाया,
 ऐसा ही जीवन है
 मैंने (तूने) पाया।।

 दुनिया को
 जीना सिखलाता ,
खुद को कैसे जीता?

 अरमानों की रेल बन गई
 इच्छा लगा पलीता।

 भरा हुआ आदर्श पलों
 में जीवन का प्रण तेरा
 सोच यही बस
मानव मन में
 रह नहीं जाए अंँधेरा।।

( सभी शिक्षकों को समर्पित )

हरिशंकर सिंह सारांश 

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