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आरजू की किताब लिए फिरता हूंँ (कविता)

हरिशंकर सिंह 'सारांश 'हरिशंकर सिंह 'सारांश ' August 8, 2022
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मेरी लेखनी मेरी कविता 
आरजू की किताब लिए फिरता हूंँ
( कविता)

जाने क्यों शिकस्त का
 अज़ाब लिए फिरता हूंँ,  
मैं क्या हूंँ
 और क्या लिए फिरता हूंँ।

उसने एक बार किया था
सवाल ए मोहब्बत,
मैं  हर एक लम्हा ,
वफा का लिए फिरता हूंँ।।

उसने पूछा
कब से नहीं सोए
 मैं जबसे रतजगों का
हिसाब लिए फिरता हूंँ।।

उसकी ख्वाहिश थी कि
वह मेरी आंखों में पानी देखे,
मैं उस वक्त से
आंसुओं का सैलाब लिए फिरता हूँँ।

अफसोस कि वह
फिर भी मेरा ना हुआ,
मैं जिसकी आरजू की
 किताब लिए फिरता हूँँ।।

हरिशंकर सिंह सारांश       

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