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मेरी लेखनी ,मेरी कविता

आकाँक्षा (एक पुकार)

बेटी हूँँ, मुझको पराई न कहना

मुझको सदा ,आपके दिल में रहना।

बेटी हूँ मुझको,पराई न कहना।।


आई हूँँ दुनिया में, सपने मेैैं लेकर

जाऊंगी तुम को, बढ़ा मान देकर

नारी हूँ मुझको, अबला न कहना।

बेटी हूूँ मुझको ,पराई न कहना।।


चारों दिशाओं में ,नाम मैैं करूँगी

दामन मैैं शिक्षा का ,जब थाम लूँगी।

मुझको सदा, तेरे साए में रहना

बेटी हूं मुझको ,पराई न कहना ।।


मुझको जीवन देने वालों से ,मेरा यह कहना

शिक्षा का अधिकार हमारा, हमको यह दिलवा दो ,आजादी से जीने का, हमको भी हक दिलवा दो।

गफलत न समझो, मैं दुनिया का गहना

बेटी हूँँ मुझको पराई न कहना।।


सदाचार और ज्ञान का दीपक, चारों ओर जलाऊँगी अधिक नहीं कर सकी तो फिर मैं ,बेटी धरम निभाउँगी।

सदाचार ,सेवा के पथ पर, मुझको निशदिन रहना।

बेटी हूँ ,मुझको पराई न कहना।।


पढ, लिखने के बाद ,सदाँ ,मैं रौशन नाम करूँगी

कभी सुनीता ,कभी कलपना ,बनकरके चमकुँगी।

गर अनपढ रह गई,जगत में कैसे नाम करूँगी

बेकारी के जीवन से कैसे बाहर निकलुँगी।

याद रहें ,ये सारी बातें,हैं दुनियाँ का गहना ।

बेटी हुँ, मुझको ,पराई न कहना।।


हरीशंकर सिंह, सारांश,


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