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मेरी लेखनी ,मेरी कविता 
"अजीब दौर है" (कविता)

अजीब दौर है। 
जीने की धमक गायब है।
चमक दमक है, 
मगर उजास गायब है।। 

रंँगो का मेला है ,
दीवानों की टोली है
इत्र है ,चंदन है, रोली है
 मगर चाह गायब है ।

चमक दमक है,
 मगर उजास गायब है ।
 
टीका है ,गुलाल है
 मिलने मिलाने की
जिद लाजवाब है।
रंँगो गुलालोका मेला है।

सब कुछ है मगर
अपनत्व गायब है।
चमक दमक है ।
मगर उजास गायब है। 
  
हरि शंकर सिंह सारांश  

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