एक सवाल सा हूँ मैं's image
Poetry1 min read

एक सवाल सा हूँ मैं

Harish VidrohiHarish Vidrohi September 15, 2022
Share0 Bookmarks 73 Reads2 Likes
बैठकर जब अकेले में यूँही,
अक्सर खुद क़ो सोचता हूँ मैं,

पुराने वक़्त की बीती बातों में,
इस कद्र गुम हो जाता हूँ मैं,

जैसे कोई शख्स टूटा है मुझमें यूँ कि,
मानो शाख से टूटा कोई पत्ता सा हूँ मैं,

मानो किसी की ह्रदय वेदना में 
आँख से गिरता आँसू सा हूँ मैं,

चीखती है ना जाने मन में कितनी बेरंग पुकारे,
जैसे गुम गई हो मेरे नाम की सभी खुसरंग बहारे,

बैठकर जब अकेले में यूँही,
अक्सर खुद क़ो सोचता हूँ मैं,

खुद में ही उलझा एक सवाल सा हूँ मैं..!!

#स्वरचित :- हरीश विद्रोही 

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts