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थोड़ा सा बचपन

Gunjan VishwakarmaGunjan Vishwakarma March 21, 2022
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जब उम्र के पड़ाव


गुज़रते जाएंगे


मील के पत्थरों की तरह


तेज़ रफ्तार से भाग रहे


इस जीवन में ।



और घड़ी की


रूकी हुई सुइयों में


जबरन रोके जाने के बावजूद


आ पहुंचेगा


घर की चौखट पर


दस्तक देने वो समय...


जब आंखें देख सकेंगी


बस मन के भीतर ।



और आंखों पर चढ़े चश्मे भी


शायद तब न देखना चाहेंगे


बाहर की आभासी


दुनिया की चहल पहल ।



जब आवाज़ें भी


गुज़र जाएंगी धुएं की तर


कानों के पास से


कुछ बुदबुदाती कुछ फुफकारती हुई ।



और यादें


धुंधली हो जाएंगी


कुहरे के पार के


किसी दृश्य सी ।


जब एकांत और अकेलेपन


के बीच की रेखा


महीन होते होते


एक दिन मिट जाएगी ।



और मोहपाश में बांधने वाली


वो अदृश्य डोर


देह की हर चटकन के साथ


टूट रही होगी ।



मैं चाहूंगी


कि


तब भी बची रहे 


मुझमें मेरी कविताएं


और थोड़ा सा बचपन ।।





~गुंजन

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