संवाद's image
Share0 Bookmarks 180 Reads2 Likes
उसे पसंद था बातें करना

उनसे

जो नहीं रखते हैं 

क़ैद अपने हृदय को

पसलियों के भीतर

जो, जब बोलते हैं

तो उनका हृदय 

होता है उनकी जिह्वा पर

और जब सुनते हैं 

वो तुम्हारी बातें

तो कान ले लेते हैं

रूप उनके हृदय का ।


इसलिए 

जब कोई न होता
 
आस पास सुनने के लिए

वो आवाज़ देती थी

ईश्वर को 

और करती थी उनसे

बतकही अनकही ।।



मुझे भी पसंद था बातें करना

उनसे
 
जो उतार दें अपने हृदय से

सभी छद्म आवरण

और हो जाएं एकाकार

स्वयं से ।


इसलिए 

जब भी मैंने सुना 

किसी के मन से होकर

आता हुआ

संबोधन

"प्रिय ईश्वर"

तो मैं भी छोड़कर

सभी बातें अधूरी

चल दिया 

पूरी करने 

उसकी अधूरी बातें ।



और इस तरह किया

उसके हृदय ने संवाद

उसकी आत्मा से ।।




~गुंजन



No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts