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एक थी कलम

जिसने स्याह किए थे न जाने कितने सफेद पोश
उसकी रगों में बहता खून अभी सफेद नहीं हुआ था

वो बेबाक बोलती थी
सच सुनती थी
और प्रत्यक्ष ही देखती थी

उसके तीखे धारदार शब्दों से
क़लम होते थे सर सरपरस्तों के

उसके फैसले 
तय करते थे किस्मत
आने वाली नस्लों की


फिर एक गुबार उठा
और सब बदल गया

कलम भी...

अब कलम से निकले शब्द जहां भी छिटकते
वहां धरती लाल हो जाती

कलम असहाय थी
उसके अस्तित्व पर लग गए थे कई प्रश्नचिन्ह

क्या अब उसे अपने स्वच्छंद आकाश में
लहराने होंगे परचम गुलामी के ?

क्या बोलनी होगी वो भाषा
जो उसकी नहीं है ?

कलम की गर्दन पर एक अदृश्य शिकंजा है
उसका गला रूंध गया है
शब्द कहीं भटक गए हैं...



कलम अब खामोश है
उसे इंतज़ार है अपनी आज़ादी का ।।




~गुंजन

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