धूप के साए's image
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धूप के गहरे साए भटकते रहे दर ब दर

वो मेरे साथ अंधेरों में भी चले आए ।

मैंने सोचा दरख्तों से टपकती ओस पी जाऊं

ये बहते हुए दरिया मेरी प्यास बुझा नहीं पाए ।।


फूलों सा महकना मुझे आया ही नहीं

बस कांटे ही कांटे मेरे पैरों को भाए ।

उड़ना था मुझे पंख पसार परिंदों की तरह

आसमानों को रास मेरे पंख नहीं आए ।।



अधूरे पड़े ख़्वाबों को करना है मुझे पूरा

बेशक मुझे रातों को अब नींद न आए ।

मंज़िल पर पहुंच कर तन्हा ही रह गए

सफ़र की भीड़ को राहों में छोड़ आए ।।





~गुंजन








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