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अगले जन्म मोहे...

Gunjan VishwakarmaGunjan Vishwakarma March 14, 2022
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ये अंधेरा उस अंधेरे से अलग था
जहां से मैं आई थी 
इस अंधेरे में निर्दयी ठंडक थी
भय था जीवन के अंत का ।

उस अंधेरे में भी नहीं दिखता था कुछ
पर वहां ऊष्मा थी
प्रेम की, 
एक जीवन डोर थी
जिससे जुड़ा होना
संकेत था मेरे जीवित होने का ।

पता नहीं 
मेरे हृदय में स्पंदन था या नहीं
पर एक ध्वनि निरंतर
मुझे आश्वासन देती थी
कि एक जीवन 
मेरी प्रतीक्षा में है ।

फिर एक दिन सुने
मैंने सुने शब्द
जिनके अर्थ मुझे ज्ञात नहीं थे
मेरी तरह मेरा ज्ञान भी संकुचित था ।

भाषा और व्याकरण 
नहीं तैर सकते थे उस द्रव्य में
जो आधार था मेरे विकास क्रम का ।

मुझे नहीं पता था 
क्या होता है 'थी' और 'था'  का अंतर
 मैंने सुना एक और शब्द
लड़की …
और उसके बाद
मैंने अनुभव किए
कुछ तीक्ष्ण प्रहार
जो किए गए थे मेरे 
अल्प विकसित आत्म सम्मान पर ।

मेरे लिए निश्चित किए गए थे अंधेरे
अब मैं हूं
निःशब्द, निस्तब्ध,निष्प्राण
पर निराश नहीं।

मुझे लड़ना है इन अंधेरों से
तब तक जब तक मैं छीन न लूं
अपने हिस्से की भोर ।

मुझे आना है तब तक
जब तक मैं न बदल जाऊं 
'थी' से 'है' में ।।

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