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एक पहर जब

चुभ जाता हैं सीने में 

और दर्द बेतरह होता है 


हथेलियों से 

छिटक जाती हैं 

मुस्कुराहटे 

अब दिन में उजास नही 

शामे सहमी सी 

और रातों का गहराता हुआ रहस्य


इन सब बातों की 

रिपोर्ट नही आती 

बस डॉक्टर सर झुकाकर 

कुछ लिखता रहता है पुर्जे पर 


और मैं ,

ख़ाली दीवारों को निहारते हुए

याद करती हूं 

वह कविता 

जो बचा सकती हैं मुझे 


जबकि मोक्ष के लिए 

सिर्फ बुदबुदाना था

अक्षि दर्पणों में ह्रदय की स्पंदनों में तुम हो

श्वास प्रश्वास में मन अभ्यंतर में तुम हो


गुंजन उपाध्याय पाठक

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