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हम दो थे

मैं और तुम

किसी छंद से टूटकर गिरे

और व्याकरण में अमानक क़रार दिए गए


हम दो थे

मैं और तुम

किसी भाषा से खाली लौटे

किसी ध्वनि में अनिश्चिन्त, अश्रव्य बैठे


हम दो थे

मै और तुम 

सारे गणितीय सिद्धांतो के परे 

हमेशा किताबों के कोने के पन्नो पर लिखे


हम दो थे 

हमेशा सारे ज्योमितिय कोणों को 

चिढ़ाते हुए

इक चाप आगे बढ़ा 

मिलते रहें 

सदियों से 

प्रकाश वर्ष की डयोढियो को लांघ 


हम दो थे

मैं और खालीपन

हम दोनों ही तो थे

हर समास में बहिष्कृत 


हम दो थे ... !


गुंजन उपाध्याय पाठक

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