छटांक's image
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देह पर उगी बेले 

और थोड़ी उदास हंसी

भीतर तक नहीं पहुंच पाने वाली रौशनी 

इंतजार रहता है उन्हें भी


एक छँटाक प्रेम

दो मीठे बोल

स्वीकार किए जाने की थोड़ी सी उम्मीद 

और इससे भी अधिक

यह संभावना 

कि कोई सुन रहा है 

कहे अनकहे लफ्जों को 


मगर खालीपन की 

रौशनी में ,

सब धुंधला ही रहता है 

और निरन्तर टूटते हुए 

आहिस्ता आहिस्ता

शब्द ,खो देते है 

अपना वजूद...............


गुंजन उपाध्याय पाठक

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